एत्तावता च अम्हेहि सम्भतं पुण्य सम्पदं।
सब्बे देवा अनुमोदन्तु सब्ब सम्पत्ति सिद्धिया।।१.
आकाशट्टा च भुम्मट्टा देवा नागा महिद्धिका।
पुण्यं तं अनुमोदित्वा चिरं रक्खन्तु लोकसासनं।।२.
इदं मे ञातीनं होतु सुखिता होन्तु ञातयो।।३.
इमिना पुण्यकम्मेन उपज्झाया गुणुत्तरा।
आचरियूपकारा च माता पिता पिया मम।।४.
सूरियो चन्दिमा राजा गुणवन्ता नरा पि च।
ब्रह्मा मारा च इन्दा च लोकपाला च देवता।।
यमो मित्रा मनुस्सा च मज्झत्ता वेरिका।।५.
सब्बे सत्ता सुखी होन्तु पुण्ञानि पक्कतामिने।
सुखं च तिविधं देन्तु खिप्पं पापं वोमतु।।६.
इमिना पुण्यकम्मेन इमिना उद्दिसेन च।
खिप्पाहं सुलभे चेव तण्हुपादानछेदनं।।७.
ये सन्ताने हीना धम्मा याव निब्बानतो ममं।
नस्सन्तु सब्बदायेव यत्थ जातो भवे भवे।।८.
उज्जुचित्तो सतिपञ्ञा सल्लेखो विरियामिना।
मारा लभन्तु नोकासं कातुं च विरियेसु मे।।९.
बुद्धादिपवरो नाथो धम्मो नाथो वरत्तमो।
नाथो पच्चेकसम्बुद्धो संघो नाथोत्तरो ममं।
तेसोत्तमानुभावेन मारोकासं लभन्तु मा।।१०.