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खन्ध (परित्त) सुत्तं

एवं मे सुतं एकं समयं भगवा, सावत्तियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन, सावत्तियं अञ्ञतरो भिक्खु अहिना दड्ढो कालकतो होति। अथ खो सब्बहुला भिक्खु येन भगवा तेनुपसङ्कमिंसु। उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदिंसु। एकमन्तं निसिन्नो खो ते भिक्खु भगवन्तं एतदवोचु— “इध भन्ते सावत्तियं अञ्ञतरो भिक्खु अहिना दड्ढो कालकतो”ति।

“नह नून सो भिक्खवे भिक्खु चत्तारि अहिराजकुलानि मेत्तेन चित्तेन फरि। सचे हि सो भिक्खवे भिक्खु चत्तारि अहिराजकुलानि, मेत्तेन चित्तेन फरेय्य, नहि सो भिक्खवे भिक्खु अहिना दड्ढो कालं करेय्य। कतमानी चत्तारि अहिराजकुलानि? विरूपक्खं अहिराजकुलं, एरापथं अहिराजकुलं, छब्यापुत्तं अहिराजकुलं, कण्हागोतम कं अहिराजकुलं। नहनून सो भिक्खवे भिक्खु, इमानि चत्तारि अहिराजकुलानि मेत्तेन चित्तेन फरि; सचे हि सो भिक्खवे भिक्खु इमानि चत्तारि अहिराजकुलानि मेत्तेन चित्तेन फरेय्य, नहि सो भिक्खवे भिक्खु अहिना दड्ढो कालं करेय्य। अनुजानामि भिक्खवे इमानि चत्तारि अहिराजकुलानि मेत्तेन चित्तेन फरितुं अत्तगुत्तिया अत्तरक्खाय अत्तपरित्तायाति।” इदमवोच भगवा इदं वत्वा सुगतो अथापरं एतदवोच सत्था—

विरूपक्खेहि मे मेत्तं, मेत्तं एरापथेहि मे।

छब्यापुत्तेहि मे मेत्तं, मेत्तं कण्हागोतकेहि च॥

अपादकेहि मे मेत्तं, मेत्तं दिपादकेहि मे।

चतुप्पदेहि मे मेत्तं, मेत्तं बहुप्पदेहि मे॥

मा मं अपादको हिंसि, मा मं हिंसि दिपादको।

मा मं चतुप्पदो हिंसि, मा मं हिंसि बहुप्पदो॥

सब्बे सत्ता सब्बे पाणा, सब्बे भूता च केवला।

सब्बे भद्राणि पस्सन्तु, मा कञ्चि पापमागमा॥

अप्पमाणो बुद्धो, अप्पमाणो धम्मो, अप्पमाणो संघो।

पमाणवन्तानि सिरिंसपानि,

अहि विच्छिका सतपदी उण्णानाभी सरबू मूसिका॥

कता मे रक्खा, कता मे परित्ता, पटिक्कमन्तु भूतानि।

सोहं नमो भगवतो, नमो सत्तन्नं सम्मासम्बुद्धानं'ति॥

खन्ध (परित्त) सुत्तं निट्ठितं